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मेरा दिल पूछ रहा है, नबी (सल्ल.) से दुश्मनी करने वाला बद्र में हारकर आज पूरी दुनिया में क्यों जीत रहा है?

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मुझे सख्त नियम पसंद नहीं हैं। मैं आसान नियमों में विश्वास करता हूं क्योंकि यहां जिंदगी पहले से ही बहुत मुश्किल है। मेरा मानना है कि हर दिन के साथ नियम और ज्यादा आसान हो जाने चाहिए ताकि यह दुनिया कहीं ज्यादा बेहतर जगह बन सके।
आज रविवार था,

इसलिए मैं यह दिन बंधी-बंधाई दिनचर्या में बर्बाद नहीं करना चाहता। मैं इत्मिनान से अखबार पढ़ता हूं, फिर टीवी पर मनपसंद कार्यक्रम देखता हूं। मुझे फिल्मों से कोई नफरत नहीं है लेकिन मैं सकारात्मक संदेश देने वाली फिल्में ही ज्यादा पसंद करता हूं जो अब बहुत कम दिखाई देती हैं।
अब अखबार अच्छी खबरें नहीं लाते और ज्यादातर टीवी चैनल्स भी यही रस्म निभा रहे हैं। अखबार मुझे बता रहे हैं कि दुनिया पर आतंकवाद का खतरा मंडरा रहा है। मैं एक चैनल पर ‘नीरजा’ फिल्म देख रहा हूं जिसमें आतंकवादी किसी हवाईजहाज का अपहरण कर यात्रियों को मौत के घाट उतार रहे हैं।

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मैं चैनल बदल देता हूं। देखूं जरा एपिक चैनल पर क्या आ रहा है! वाह, यहां तो बहुत खूबसूरत कुदरती नजारे हैं, खूबसूरत पहाड़ियां हैं। अचानक बंदूक लेकर एक आदमी आता है। मालूम हुआ कि यह अफगानिस्तान की कहानी है। यहां तालिबान किसी महिला की गर्दन कलम करने की योजना बना रहे हैं।
अब मैं फेसबुक अकाउंट चेक कर रहा हूं। आज मुझे ढेर सारी दुआएं और कुछ गालियां मिली हैं। फेसबुक पर चर्चा है कि अमरीकी चुनावों पर आतंकी संगठन आईएसआईएस की नजर है। वह कहीं भी धमाके कर सकता है। एक और पोस्ट में बताया जा रहा है कि इराक में आईएसआईएस कैसे गर्दनें उड़ा रहा है।
हर कहीं मुसलमानों की चर्चा है लेकिन अच्छी खबर एक भी नहीं। क्या वजह है कि आज इस्लामी जगत से अच्छी खबरें बहुत कम या न के बराबर मिलती हैं। इराक, सीरिया, पाकिस्तान, सोमालिया, बांग्लादेश, अफगानिस्तान हर जगह मानो आग लगी है। जिस दीन में एक-दूसरे का अभिनंदन करने में भी सलामती की दुआ की जाती है, उसी को मानने वाले देशों में आज कोई सलामत क्यों नहीं है? जो कुरआन सबसे पहले रब की रहमदिली की बात कहता है, आज गैर-मुस्लिमों में उसके नाम से खौफ क्यों है? ऐसा जमाना तो पहले नहीं देखा था।

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माफ कीजिए, यह सब देखकर मेरे दिल से एक ही बात निकलती है कि इस्लाम का दुश्मन बद्र में हार गया था लेकिन आज पूरी दुनिया में जीत रहा है। ये हालात क्यों बने? कृपया दिमाग शांत रखिए और इस विषय पर विचार कीजिए। यह वक्त इस सवाल को नजरअंदाज करने का नहीं है, क्योंकि आप आंखें मूंदेंगे तो आगे आने वाली नस्लों की आंखों से आंसू बहते रहेंगे। जरा सोचिए, आज कुछ लोगों ने ऐसे हालात क्यों बना दिए? ये इतने ज्यादा ताकतवर क्यों हो गए हैं?
जहां तक मेरी समझ का सवाल है, मुझे ऐसी तीन वजह नजर आती हैं जिन्होंने मुसलमानों का बहुत नुकसान किया है। जरा ध्यान से पढ़िए।
1- इस्लाम में सबसे बड़े नायक हैं पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल.)। दुनिया में ऐसे लाखों मुसलमान हैं जिन्होंने जिंदगी में नहीं पढ़ा कि प्यारे नबी (सल्ल.) वास्तव में कैसे थे, क्या चाहते थे, कैसी बातें किया करते थे। वे लोग अपनी बुद्धि को जरा भी तकलीफ नहीं देना चाहते कि प्यारे नबी (सल्ल.) का पैगाम क्या था, आपका (सल्ल.) चरित्र क्या था।
2- हर धर्म में एक दौर ऐसा आता है जब बुरे इरादों के साथ कोई व्यक्ति या गिरोह खड़ा होता है। मिसाल तब बनती है जब उसी धर्म के लोग उसके खिलाफ खड़े हों और उस विचार का खात्मा करें। आज कुछ भटके हुए लोग इस्लाम के नाम पर ऐसे ही गिरोह बना रहे हैं। अच्छा हो कि उनके ताकतवर बनने से पहले मुसलमान उनके खिलाफ खड़े हों, वर्ना वे सबसे ज्यादा खून मुसलमान का ही बहाएंगे और बहा रहे हैं।

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3- गैर-मुस्लिम समाज की समस्या यह है कि वह इस बात को बहुत गौर से सुनता है कि टीवी क्या कहता है, लेकिन वह इस बात को नहीं सुनना चाहता कि कुरआन क्या कहता है, हजरत मुहम्मद (सल्ल.) का जीवन क्या कहता है। गलतफहमी की शुरुआत यहीं से होती है।
अब मैं आपको मेरे जीवन की एक घटना सुनाता हूं। कुछ दिनों पहले मुझे फेसबुक पर किसी मित्र ने एक अखबार की तस्वीर भेजी। उसमें जिक्र था कि अफगानिस्तान में कोई शादी हुई जहां गाने-बजाने का कार्यक्रम हो रहा था। उसमें सिर्फ औरतें शामिल थीं। तालिबान को यह अच्छा नहीं लगा और उसने दूसरे दिन चार महिलाओं को गोली मार दी। उन मित्र का सवाल था – राजीव, इस पर तुम्हारा क्या कहना है? अब मान भी लो, इस्लाम का सच्चा चेहरा यही है।
मैंने इस सवाल के बदले उनसे सवाल किया- क्या आप कोई एक घटना बता सकते हैं जब हजरत मुहम्मद (सल्ल.) ने किसी बच्ची या महिला को पीटा हो, जान लेना तो बहुत दूर की बात है? इसके बाद उनका कोई जवाब नहीं आया। उन्होंने एक घटना का जिक्र किया था, मैंने बदले में तीन घटनाएं उन्हें लिख भेजीं। जरा आप भी पढ़िए।
– प्यारे नबी (सल्ल.) हिजरत कर मदीना पहुंचे। उस दिन क्या बच्चे और क्या बच्चियां, सब स्वागत गीत गा रहे थे। सुनकर आपने (सल्ल.) उनसे पूछा, क्या तुम मुझसे मुहब्बत करते हो? सभी ने कहा- जी हां। आपने (सल्ल.) बच्चों से स्नेह जताते हुए कहा- मैं भी तुमसे मुहब्बत करता हूं।

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– ईद का दिन था। आप (सल्ल.) विश्राम कर रहे थे। चेहरा चादर से ढंक रखा था। इतने में ही कुछ बच्चियां आ गईं और गाने-बजाने लगीं। तभी हजरत अबू-बक्र (रजि.) आ गए। देखा, नबी (सल्ल.) विश्राम कर रहे हैं, बच्चियां गीत गा रही हैं। कहीं इनके गाने-बजाने से आपके (सल्ल.) विश्राम में कोई बाधा न पहुंचे। उन्होंने बच्चियों को डांट दिया। यह सुनते ही आपने (सल्ल.) चेहरे से चादर हटाई और फरमाया – गाने दो, आज इनकी ईद है।
(विशेष- अरब का संगीत आज भी बहुत अच्छा है।)
– एक सहाबी अपने पुराने दिनों का किस्सा सुना रहे थे। तब वे इस्लाम में दाखिल नहीं हुए थे। उनके परिवार में बच्चियों को जिंदा दफन करने का रिवाज था। सहाबी ने कहा, मैंने अपनी बच्ची को जिंदा ही दफन कर दिया। वह अब्बा-अब्बा पुकार रही थी, मैं उस पर मिट्टी डाल रहा था। रब के रसूल (सल्ल.) ने सुना तो इतना रोए कि चेहरा आंसुओं से भीग गया। रसूल (सल्ल.) का दिल इतना नर्म था।
हो सकता है कि आज संगीत सुनने पर आईएसआईएस किसी की गर्दन उड़ा दे, हो सकता है कि तालिबान, अल-कायदा पीट-पीटकर अधमरा कर दें और वे खुद को सच की राह पर मानें लेकिन उनके किसी दावे से पहले यह तो देख लें कि वे कितने सच्चे हैं।

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चलते-चलते
हर दौर में ऐसे लोग पैदा हो जाते हैं जिनके इरादे बुरे होते हैं। वे लोगों के दिमाग पर कब्जा करना चाहते हैं ताकि उन पर कोई रोकटोक बाकी न रहे। हमने रावण और कंस जैसे दहशतगर्दों का दौर देखा है। उनके जवाब में राम व कृष्ण को आगे आना ही पड़ा। आज बगदादी, हाफिज सईद, अल-जवाहिरी जैसे आतंकी चेहरा बदलकर आ गए। ये रब के, कुरआन के, रसूल (सल्ल.) के और इस्लाम के दुश्मन हैं। इन्होंने सबसे ज्यादा नुकसान मुसलमानों का किया है।
ऐसे लोगों के मुकाबले आप में से ही किसी अब्दुल कलाम, अशफाक उल्ला खां, अब्दुल गफ्फार खान और फातिमा अल फिहरी को आगे आना होगा।
भाइयों और बहनों, कुरआन और नबी (सल्ल.) का नाम तो कयामत तक रहेगा पर हमारी जिंदगी बहुत छोटी है। यह जितनी भी है, इसका हर लम्हा बहुत समझदारी से नेक कामों के नाम करें।
हम सबको रब ने सबसे ऊपर दिमाग दिया है। कृपया इसका सही इस्तेमाल करें। चाहे कितना भी बड़ा नेता, अभिनेता या धर्मगुरु हो, अपनी अक्ल किसी को पट्टे पर लिखकर उसके नाम न करें। यह आंखें खोलने का वक्त है। कहीं देर न हो जाए।
– राजीव शर्मा (कोलसिया) –

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